सच बोलने पर शिक्षा!

सच बोलने पर शिक्षा

अमेरिका के इतिहास में सबसे ज्यादा सक्षम, समझदार और कूटनीतिक आदमी बनाया, एक बार जब बेन फ्रैंकलिन युवा थे, एक पुराना क्वेकर दोस्त उन्हें अलग ले गया और उसने उन्हें कुछ कड़वे सच बोले, जो कुछ इस तरह थे- 'बेन, तुम नामुमकिन हो। जो भी इंसान तुमसे असहमत होता है, उसके लिए तुम्हारे विचार थप्पड़ की तरह होते हैं। वे इतने आक्रामक हो गए हैं कि कोई उनकी परवाह नहीं करता। तुम्हारे दोस्त ज्यादा खुश होते हैं, जब तुम आस-पास नहीं होते हो। तुम इतना अधिक जानते हो कि कोई तुम्हें कुछ नहीं बता सकता। सच में, कोई इंसान कोशिश भी नहीं करेगा, क्योंकि इससे सिर्फ परेशानी और दिक्कत पैदा होगी। इसलिए तुम्हारे कुछ और सीखने की उम्मीद खत्म हो गई है। बेन फ्रैंकलिन की एक सबसे अच्छी बात यह थी कि वे आलोचना को समझदारी से ग्रहण करते थे। वे इतने बड़े और समझदार थे कि इस आलोचना में सच देख सकते थे और महसूस कर सकते थे कि इससे वे असफल और सामाजिक रूप से असफल हो जाएंगे। इसलिए उन्होंने निर्णय लिया, उन्होंने अपने तरीकों में बदलाव लाना शुरु कर दिया। “मैंने इसे एक नियम बना लिया, फ्रैंकलिन ने कहा-"कि मैं कभी भी दूसरों की भावनाओं के खिलाफ कुछ नहीं बोलूंगा और अपनी सोच दूसरों पर नहीं थोपंगा!

मैंने अपनी भाषा से हर उस शब्द को हटा दिया, जो कठोर विचार का संकेत करते थे, जैसे 'निश्चित ही', 'बेशक' आदि और उनके बदले 'मैं मानता हं' 'मैं सोचता हं' या 'मुझे लगता है या फिर 'फिलहाल मेरी यह सोच है' जैसे शब्दों को मैंने अपना लिया। का जब कोई और इंसान ऐसी बात बताता था, जो मेरी नजर में गलत थी. मैं समोगलत कहने का या उसके तर्क में कमी दिखाने का आनंद नहीं उठाता था और मेरा जवाब होता था कि कुछ मामलों में या परिस्थितियों में उसकी बात सही हो सकती है, पर इस मामले में इस पर फिर से सोचने की जरूरत है। इसका फायदा यह हुआ कि मेरी लोगों से बातचीत ज्यादा आनंददायक टो! जिस विनम्रता से मैं अपनी बात रखता था, उससे बहसें कम हो गईं!

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