सोच बदलते रहने पर शिक्षा!

सोच बदलते रहने पर शिक्षा!

मैं तुमसे ज्यादा कभी भी यह घोषणा करके शुरुआत न करें मैं तुम्हें यह और न करूंगा यह सही नहीं है, यह कुछ इस तरह कहने जैसा होगा मैं तमसे स्मार्ट हूं। मैं तुम्हें एक या दो चीजें बताऊंगा, जिससे तुम्हारी सोच बदल जा यह एक चुनौती है। इससे विरोध जगता है और आपको सुनने वाला आ शुरुआत से पहले ही आपसे झगड़ने को तैयार हो जाता है। अच्छे माहौल में भी लोगों की सोच को बदलना मुश्किल होता है, तो उसे और मुश्किल क्यों बनाया जाए? अपने आपको और लाचार क्यों किया जा अगर आप कुछ सिद्ध करने जा रहे हैं, तो किसी को पता न चलने दें। इसे इतने सूक्ष्म तरीके से, इतनी कुशलता से करें कि किसी को यह न लगे कि आप क्या कर रहे हैं। इस बात को अलेक्जेंडर पोप ने काफी अच्छे ढंग से कहा था- इंसानों को ऐसे सिखाएं जैसे सिखाया न जा रहा हो, अनजान चीजें ऐसे बताएं जैसे उन्हें वह भूल गया हो। लगभग तीन सौ साल पहले गैलीलियो ने कहा था- आप किसी आदमी को कुछ सिखा नहीं सकते, आप बस उसे वह चीज खुद पाने में मदद कर सकते हैं। जैसे लॉर्ड चेस्टरफील्ड ने अपने बेटे से कहा था दसरे लोगों से ज्यादा समझदार बनो अगर बन सको पर उन्हें कभी बताओ मत। सकरात ने एथेंस में अपने अनुयायियों से बारंबार कहा था- मैं बस एक चीज जानता हूं, वह यह कि मैं कुछ नहीं जानता। अच्छा, मैं खद को सुकरात से ज्यादा बुद्धिमान नहीं मानता, इसलिए मैंने लोगों को दिया है कि वे गलत हैं और मैंने देखा कि इससे लाभ होता है! जरूरी होता है और इससे ठीक बर्ताव करना समझदारी की शुरुआत है। इसमें वही ताकत है भले ही 'मेरे' डिनर, 'मेरे' कुत्ते, 'मेरे' घर, 'मेरे पिता, 'मेरे देश या 'मेरे' भगवान की बात हो रही हो। हम सिर्फ यह आरोप पसंद नहीं करते कि हमारी घड़ी गलत है, हमारी कार खराब है, पर हमें यह भी पसंद नहीं आता कि मार्स की नहरों के बारे में हमारी सोच, 'एपिटेक्टस' का हमारा उच्चारण, हमारे हिसाब से साइलीसिन का चिकित्सीय महत्त्व और सारगन वन की तिथि भी दुहराने के लायक है! जिस चीज को हमने सही माना है, हम उस पर विश्वास करते रहना चाहते हैं और उस पर किसी के शंका करने से हममें प्रतिरोध पैदा होता है जिस कारण से हम उस पर टिके रहने का हर बहाना ढूंढते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हमारी तथाकथित तर्क क्षमता हमेशा तर्क खोजने में लगी रहती है, ताकि हम पुराने विश्वास पर कायम रहें!

एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल रोजर्स ने अपनी किताब 'ऑन बिकमिंग ए पर्सन' में लिखा है- मुझे इस बात से काफी लाभ मिलता है, जब मैं खुद को दूसरे इंसान को समझने की अनुमति देता हूं। मैंने जिस तरह से बात लिखी है, वह आपको अजीब लग सकती है। क्या खुद को दूसरे को समझने की अनुमति देना जरूरी है? मुझे लगता है, यह है। दूसरों की बातें सनकर हमारी पहली प्रतिक्रिया होती है कि हम उसे समझने के बदले सही या गलत ठहराने लगते हैं। जब कोई अपनी भावना, धारणा या बात व्यक्त करता है, हमारी प्रवृत्ति उसे तुरंत 'सही', 'मूर्खतापूर्ण', 'असामान्य', 'अतार्किक' या 'गलत' ठहराने लगती है। शायद ही हम कभी खुद को यह समझने की अनुमति देते हैं कि उस बात का उस इंसान के लिए क्या मतलब है!

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