ईमानदारी पर शीक्षा!

ईमानदारी पर शीक्षा!

ईमानदार रहिए जिन चीजों पर अपनी गलती स्वीकार कर सकते हैं, स्वीकार कीजिए अपनी गलतियों के लिए खेद व्यक्त कीजिए। इससे आपसे झगड़ने वाले का प्रतिरोध कम होगा। अपने विपक्षी के आइडिया पर सोचिए और उनका बारीकी से अध्ययन कीजिए। ऐसा सच्चाई से कीजिए। हो सकता है, वह सही हो। इस चरण पर उनके बारे में सोच विचारकर उनसे सहमति बनाना अच्छा है, नहीं तो जल्दी से आगे बढ़ जाएंगे और ऐसी स्थिति में पहुंच जाएंगे, जहां आपका विपक्षी कह सके "हमने बताने की कोशिश की थी, पर तुम सुनते कहां हो!" अपने विपक्षियों का दिलचस्पी दिखाने के लिए धन्यवाद कीजिए। जो भी आपसे असहमति बनाने के लिए वक्त निकालता है, वह उन्हीं चीजों को चाहता है जिन्हें आप चाहते हैं। उन्हें वैसे लोगों की तरह सोचिए, जो आपकी मदद करना चाहते हैं और फिर आपके विपक्षी आपके दोस्त बन जाएंगे। दोनों पक्ष अच्छी तरह से समस्या पर सोच सकें, इसलिए कुछ समय के लिए कोई कदम न उठाएं। सलाह दीजिए कि अगली मीटिंग उस दिन बाद में या अगले दिन रखी जाए, ताकि सारे तथ्यों को सामने लाया जा सके। इस मीटिंग की तैयारी में खुद से कुछ कठिन सवाल पूछे- क्या मेरे विपक्षी सही हो सकते हैं? थोड़ा-बहुत? क्या उनकी बातों और तर्क में मतलब है? क्या मेरी प्रतिक्रिया समस्या का हल निकालेगी या फिर सिर्फ मेरी हताशा निकालेगी? क्या मेरी प्रतिक्रिया मेरे विपक्षियों को मुझसे दूर ले जाएगी या मेरे करीब ले आएगी!

क्या मेरी प्रतिक्रिया मुझे लोगों की नजरों में ऊपर ले जाएगी? क्या मैं जीतूंगा या हारुंगा? जीतने पर मुझे क्या कीमत चुकानी होगी? अगर मैं चुप रह जाऊं तो क्या यह विवाद समाप्त हो जाएगा? क्या यह कठिन परिस्थिति मेरे लिए एक अवसर है? ओपेरा टेनर जॉन पियर्स, शादी के करीब पचास साल बाद एक दिन मुझसे बोले-"मैं और मेरी पत्नी ने एक समझौता किया है और हमने इसका पालन किया है, भले ही हम एक-दूसरे पर कितना भी गुस्सा हो जाएं। जब एक चिल्लाता है, तब दूसरा सुनता है क्योंकि जब दो लोग चिल्लाते हैं तो कोई संवाद नहीं होता. सिर्फ शोरगुल होता है!

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